All India Judicial Service अखिल भारतीय न्यायिक सेवा – At present, there is no consensus on the proposal for setting up AIJS

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All India Judicial Service अखिल भारतीय न्यायिक सेवा – At present, there is no consensus on the proposal for setting up AIJS

All India Judicial Service अखिल भारतीय न्यायिक सेवा – At present, there is no consensus on the proposal for setting up AIJS


All India Judicial Service

Will the Minister of LAW AND JUSTICE be pleased to state:

(a) whether the Government has planned to set up an All India JudicialService to fill the vacancies in the higher judiciary and give representation to marginalized sections of the society therein;

(b)if so, the details and the status thereof and if not, the reasons therefor; and

(c)the details of other steps taken by the Government to ensure representation of marginalized sections of the society in the higher judiciary?



(a) to (c): The Constitution (Forty Second Amendment) Act, 1976inserted a clause in Article 312 of the Constitution which provides for creation of an All India Judicial Services (AIJS). The constitutional provision enables creation of the AIJS at District Judge level, not including any post inferior to that of a District Judge. In Government’s view, a properly framed All India Judicial Service is important to strengthen overall justice delivery system. This will give an opportunity for induction of suitably qualified fresh legal talent selected through a proper all-India merit selection system as well as address the issue of social inclusion by enabling suitable representation to marginalized and deprived sections of society.

A comprehensive proposal was formulated for the constitution of an All India Judicial Service (AIJS) and the same was approved by the Committee of Secretaries in November, 2012. Besides attracting some of the best talent in the country, it may also facilitate inclusion of competent persons from marginalized sections and women in the judiciary. The proposal was included as an agenda item in the Conference of Chief Ministers and Chief Justices of the High Courts held in April, 2013 and it was decided that the issue needs further deliberation and consideration.

The views of the State Governments and High Courts were sought on the proposal. There was divergence of opinion among the State Governments and among the High Courts on the constitution of All India Judicial Service. While some State Governments and High Courts favoured the proposal, some were not in favour of creation of All India Judicial Service while some others wanted changes in the proposal formulated by the Central Government.

The matter regarding creation of a Judicial Service Commission to help the recruitment to the post of district judges and review of selection process of judges/ judicial officers at all level was also included in the agenda for the Chief Justices Conference, which was held on 03rd and 04th April, 2015, wherein it was resolved to leave it open to the respective High Courts to evolve appropriate methods within the existing system to fill up the vacancies for appointment of District judges expeditiously. The matter was also placed in the Joint Conference of Chief Ministers and Chief Justices of High Courts held the next day, i.e. 5th April 2015

In a meeting chaired by Minister of Law and Justice on 16th January 2017 in the presence of Minister of State for Law and Justice, Attorney General for India, Solicitor General of India, Secretaries of Department of Justice,  Department of Legal Affairs and Legislative Department, the setting up of an All India Judicial Service was discussed on the points of eligibility, age, selection criteria, qualification, reservations etc. Setting up AIJS was also deliberated in a meeting of the Parliamentary Consultative Committee in March, 2017 and the Parliamentary Committee on the Welfare of SCs/STs on 22.02.2021.

In view of the existing divergence of opinion amongst the major stakeholders, at present, there is no consensus on the proposal for setting up an All India Judicial Service.

Appointment of Judges in the higher judiciary (Supreme Court and High Courts) is made under Articles 124, 217 and 224 of the Constitution of India, which do not provide for reservation for any caste or class of persons. The primary responsibility for making recommendations against vacancies in the High Court vests with the High Court Collegium.

In order to replace the Collegium system of appointments of Judges of the Supreme Court and High Courts with a more broad-based, transparent, accountable appointment mechanism and to bring greater objectivity in the system, the Government brought into operation the Constitution (Ninety-Ninth Amendment) Act, 2014 and the National Judicial Appointments Commission Act, 2014 w.e.f. 13.04.2015. However, both the Acts were challenged in the Supreme Court. The Supreme Court vide Judgment dated 16.10.2015 declared both the Acts as unconstitutional and void. The Collegium system as existing prior to the enforcement of the Constitution (Ninety-Ninth Amendment) Act, 2014 was declared to be operative.

In the present system of appointment of Judges to the constitutional courts through the Collegium system, the onus to provide social diversity and representation to all sections of the society including SC/ST/OBC/Women/Minorities, primarily falls on the Judiciary. Government cannot appoint any person as High Court Judge who is not recommended by the High Court Collegium/Supreme Court Collegium.

However, the Government remains committed to social diversity in the appointment of Judges in the Higher Judiciary and has been requesting the Chief Justices of High Courts that, while sending proposals for appointment of Judges, due consideration be given to suitable candidates belonging to Scheduled Castes, Scheduled Tribes, Other Backward Classes, Minorities and Women to ensure social diversity in appointment of Judges in High Courts.


भारत सरकार
विधि और न्याय मंत्रालय
न्याय विभाग
लोक सभा
तारांकित प्रश्न सं. *39
जिसका उत्तर शुक्रवार, 21 जुलाई, 2023 को दिया जाना है

अखिल भारतीय न्यायिक सेवा

*39. डॉ. बीसेट्टी वेंकट सत्यवती :

क्या विधि और न्याय मंत्री यह बताने की कृपा करेंगे कि :

(क) क्या सरकार ने उच्चतर न्यायपालिका में रिक्त पदों को भरने और उसमें समाज के उपेक्षित वर्गों को प्रतिनिधित्व देने के लिए अखिल भारतीय न्यायिक सेवा स्थापित करने की योजना बनाई

(ख) यदि हां, तो तत्संबंधी ब्यौरा और स्थिति क्‍या है और यदि नहीं, तो इसके क्या कारण हैं; और (ग) उच्चतर न्यायपालिका में समाज के उपेक्षित वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए अन्य कदमों का ब्यौरा क्या है?


विधि और न्याय मंत्रालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार);
संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री; और
संस्कृति मंत्रालय में राज्य मंत्री
(श्री अर्जुन राम मेघवाल)

(क) से (ग) : एक विवरण सदन के पटल पर रख दिया गया है ।

“अखिल भारतीय न्यायिक सेवा” से संबंधित 31.07.2023 को उत्तर देने के लिए लोक सभा तारांकित प्रश्न सं. *३१9 के भाग (क) से (ग) के उत्तर में निर्दिष्ट विवरण

(क) से (ग) : संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 ने संविधान में अनुच्छेद 312 अंतःस्थापित किया जो अखिल भारतीय न्यायिक सेवाओं (एआईजेएस) के सृजन का उपबंध करता है । संवैधानिक उपबंध एआईजेएस के जिला न्यायाधीश स्तर पर सृजन को समर्थ करता है, जिसमें जिला न्यायाधीश से निम्न कोई पद सम्मिलित नहीं है | सरकार के दृष्टिकोण में उचित ढंग से विरचित अखिल भारतीय न्यायिक सेवा संपूर्ण न्याय परिदान प्रणाली को मजबूत करने के लिए आवश्यक है । यह एक उचित अखिल भारतीय मेधावी चयन प्रणाली के माध्यम से उपयुक्त योग्यता वाली नई विधिक प्रतिभा के प्रवेश का अवसर प्रदान करने के साथ-साथ समाज के सीमांत और वंचित वर्गों के उचित प्रतिनिधित्व को समर्थ बनाकर सामाजिक समादेश के मुद्दे को भी हल करेगा।

अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (एआईजेएस) के गठन के लिए एक विस्तृत प्रस्ताव विरचित किया गया था और उसे नवंबर, 2012 में सचिवों की समिति द्वारा अनुमोदित किया गया था । देश में जि सर्वोत्तम प्रतिभाओं को आकर्षित करने के अतिरिक्त यह न्यायपालिका में सीमांत वर्गों और महिलाओं में से सक्षम व्यक्तियों के समावेश को भी सुकर बना सकता है।
अप्रैल, 2013 में आयोजित मुख्यमंत्रियों तथा उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायमूर्तियों के अधिवेशन में इस प्रस्ताव को अजेंडा आइटम के रूप में सम्मिलित किया गया तथा यह विनिश्चत किया गया कि इस मुद्दे पर और बातचीत तथा विचार करने की आवश्यकता है ।

राज्य सरकारों तथा उच्च न्यायालयों के विचार इस प्रस्ताव पर मांगे गए | अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन पर राज्य सरकारों तथा उच्च न्यायालयों के बीच विचारों की भिन्नता थी। जब कि कुछ राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, कुछ अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के सृजन के पक्ष में नहीं थे, जबकि कुछ अन्य केन्द्रीय सरकार द्वारा विरचित प्रस्ताव में परिवर्तन चाहते थे ।

जिला न्यायाधीशों के पद पर भर्ती तथा सभी स्तरों पर न्यायाधीशों/न्यायिक अधिकारियों की चयन प्रक्रिया के पुनर्विलोकन में सहायता के लिए न्यायिक सेवा आयोग के सृजन के संबंध में विषय भी मुख्य न्यायमूर्तियों के अधिवेशन के लिए अजेंडा के रूप में सम्मिलित किया गया, जो 03 और 04 अप्रेल, 2015 को आयोजित किया गया था, जिसमें त्वरित ढंग से जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए रिक्तियों को भरने की विद्यमान प्रणाली के भीतर समुचित पद्धतियों के सृजन के लिए संबंधित उच्च न्यायालयों को निर्णय करने के लिए संकल्प किया गया । अगले दिन अर्थात्‌ 05 अप्रैल, 2015 को आयोजित मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायमूर्तियों के संयुक्त अधिवेशन में भी इस मामले को रखा गया ।

16 जनवरी, 2017 को विधि और न्याय राज्य मंत्री, भारत के महान्यायवादी, भारत के महा-सालिसिटर, न्याय विभाग, विधि कार्य विभाग और विधायी विभाग के सचिवों की उपस्थिति में विधि और न्याय मंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में, पात्रता, आयु, चयन का मापदंड, अर्हता, आरक्षण आदि के मुद्दों पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन पर विचार किया गया। मार्च, 2017 में संसदीय सलाहकार समिति की बैठक में भी एआईजेएस के गठन पर विमर्श हुआ तथा 22.02.2021 को एस.सी./एस.टी. के कल्याण पर संसदीय समिति में भी विचार किया गया।

मुख्य पणधारियों के बीच राय की विद्यमान भिन्नता को रृष्टिगत रखते हुए अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन के लिए प्रस्ताव पर कोई सहमति नहीं है ।

उच्चतर न्यायपालिका (उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय) में न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 224 के अधीन की जाती है, जो किसी जाति या व्यक्तियों के वर्ग के लिए आरक्षण का उपबंध नहीं करते । उच्च न्यायालयों में रिक्तियों के लिए सिफारिशें करने का प्राथमिक उत्तरदायित्व उच्च न्यायालय कालेजियम का है ।

उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्तियों के कालेजियम सिस्टम को एक विस्तृत, पारदर्शी, जवाबदेह, नियुक्ति प्रणाली से बदलने के लिए तथा प्रणाली को अधिक उद्देश्यपूर्ण बनाने के लिए, सरकार ने संविधान (निन्यानवेंवां संशोधन) अधिनियम, 2014 तथा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम, 2014, तारीख 13.04.2015 से प्रचालित किया। तथापि, दोनों अधिनियमों को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई । उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय तारीख 16.10.2015 द्वारा दोनों अधिनियमों को असंवैधानिक और शून्य घोषित कर दिया। संविधान (निन्यानवेंवां संशोधन) अधिनियम, 2014 के प्रवर्तन के पूर्व यथाविद्यमान कालेजियम सिस्टम को प्रचालित घोषित कर दिया गया ।

कालेजियम सिस्टम के माध्यम से संवैधानिक न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की वर्तमान प्रणाली में सामाजिक विविधता प्रदान करने तथा एस.सी./एस.टी./ओ.बी.सी/महिलाओं/अल्पसंख्यकों समेत समाज के सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का भार प्राथमिक रूप से न्यायपालिका पर है | सरकार किसी व्यक्ति को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त नहीं कर सकती जिसकी सिफारिश उच्च न्यायालय कालेजियम/उच्चतम न्यायालय कालेजियम द्वारा नहीं की जाती।

तथापि, सरकार उच्चतम न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति में सामाजिक विविधता के लिए प्रतिबद्ध है तथा उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायमूर्तियों से अनुरोध कर रही है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए प्रस्तावों को भेजते समय उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति में सामाजित विविधता सुनिश्चित करने के लिए अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों, अल्प संख्यकों और महिला वर्गों से आने वाले उचित उम्मीदवारों पर सम्यक्‌ विचार किया जाए |


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